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مقتل بهلول
شيخ محمد تقى بهلول
تنظيم كننده : حسين محمدى گل تپه
- ۲ -
دو لشگر آماده براى جنگ
| در اين صحراى خونخوار |
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پى اجراى پيكار |
| شود ديده دو عسكر |
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به يكديگر برابر |
| تمامى از پى رزم |
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بكرده عزم ها جزم |
| وليكن اين دو لشكر |
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نمى باشند هم سر |
| بود اين دو سپه را |
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تفاوت آشكارا |
| هم از مقدار و سردار |
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هم از احوال افراد |
| گروهى دشمن حق |
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گروهى حق مطلق |
| گروهى بيش از آلاف |
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همه بى عدل و انصاف |
| گروهى از دو صد كم |
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همه در عدل محكم |
| گروهى را ذخيره |
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شده شش ماهه جيره |
| رسد هر لحظه از شهر |
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به آن ها قوت و ظهر |
| شكمها سير از نان |
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براى چهارپايان |
| به امر مير كوفه |
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رسد هر دم علوفه |
| گروهى زار و بى تاب |
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نه نان دارند و نه آب |
| ز شهر و ملك خود دور |
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ميان خلق مهجور |
| ره آذوقه بسته |
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دل جمله شكسته |
| همه دارند روزه |
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همه تشنه سه روزه |
| گروهى فارغ البال |
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نه زن همره نه اطفال |
| نه اندر دل يك ارزن |
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خيال دختر و زن |
| همه ترتيب داده |
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امور خانواده |
| زنان و طفلهاشان |
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دل آسوده به جاشان |
| نشسته شاد و آرام |
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نديده جور ايام |
| گروهى را به همراه |
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زنان دل پر از آه |
| صغيران پريشان |
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ز ديده اشك پاشان |
| از او زنهاى غمناك |
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فغان رفته به افلاك |
| يكى را قحطى آب |
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برون برده ز سر خواب |
| يك در فكر اولاد |
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به عرشش رفته فرياد |
| يكى بيم جوانش |
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ز درد آتش به جانش |
| به دل گويد كه اكبر |
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بود شبه پيمبر |
| مبادا كشته گردد |
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به خون آغشته گردد |
| يكى را شيرخواره |
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ميان گاهواره |
| ز فقد آب در تب |
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رسيده روح بر لب |
| گروهى كم ز حيوان |
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برى از خوى انسان |
| همه مثل بهائم |
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پى جمع غنائم |
| همه اشباع انعام |
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نبرده بو ز اسلام |
| نفهميده ز هستى |
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به جز شهوت پرستى |
| ز خر صد مرحله پست |
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به شوق جايزه مست |
| دل آنها مخالف |
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به انواع عواطف |
| مريد درهم و پول |
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خجل از فعلشان غول |
| اسير نفس شيطان |
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مطيع آل سفيان |
| به هشته گنج عقبى |
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براى حال دنيا |
| فكنده بر جبين چين |
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ز بغض آل ياسين |
| كمرها بسته يكسر |
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به كين پور حيدر |
| گشوده دستها را |
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به قتل نسل زهرا |
| همه شوم و عنيدند |
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طرفدار يزيدند |
| گروهى پاك دامان |
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همه اصحاب ايمان |
| همه با دانش و هوش |
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همه كم حرف و خاموش |
| همه اهل فضائل |
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همه پاك از رذائل |
| همه ابدال و اوتاد |
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همه زهّاد و عبّاد |
| همه در جنگ رستم |
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همه در جود حاتم |
| شهيد نشاءتين اند |
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هواخواه حسينند |
آغاز جنگ
| چو خورشيد جهانگير |
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بقدر طول يك تير |
| ز مشرق كرد طى راه |
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عيان گرديد ناگاه |
| در افواج يزيدى |
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جُم و جوش شديدى |
| سپه سالار اردو |
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نكرده عقل و دين بو |
| عمر بن سعد وقاص |
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به بحر جهل غواص |
| غريق قلزم قى |
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حريص كشور رى |
| ز جاى خود بر آمد |
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به پيش عسكر آمد |
| به فرمان دادن او |
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مرتب گشت اردو |
| نبرده از حيا سهم |
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نهاده در كمان سهم |
| بگفت اى جمع ياران |
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پياده يا سواران |
| به سوى من نگاهى |
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كنيد آنگه گواهى |
| دهيد اندر بر مير |
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كه اول من زدم تير |
| چو تير آن مرد نامرد |
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رها سوى حسين كرد |
| شد از آن زشتكاران |
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شروع تير باران |
| كمان داران هر صف |
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كمان بگرفته بر كف |
| خدنگ از آن كمانها |
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پرد سوى نشانها |
| هوا از پرّش آن |
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چو جولانگاه مرغان |
| ورودش بر هدفها |
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بلرز افكنده صفها |
| ز ضرب نعل اسبان |
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زمين گرديد جنبان |
| غبار آنسان عيان شد |
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كه خور در آن نهان شد |
| تو گفتى ابر مرگ است |
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خدنگ آنرا تگرگ است |
| چو ياران شهنشاه |
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جنود خاص الله |
| هجوم تير ديدند |
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سپر در سر كشيدند |
| به ميدان پا فشردند |
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به حربه دست بردند |
| ز جام عشق حق مست |
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سنان و تيغ در دست |
| سبك كردند جمله |
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به دشمن سخت حمله |
| بدل شد تير جنگى |
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به يك شمشير جنگى |
| غبار آنسان عيان شد |
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كه خور در آن نهان شد |
| قريب يك دو ساعت |
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شدند آن دو جماعت |
| به هم مشغول پيكار |
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ز هر دو كشته بسيار |
| سپس آن جنگ سر شد |
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عيان وضع دگر شد |
| دو قوم از هم جدا شد |
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بيابان بى صدا شد |
| به جاى خويش هر قوم |
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ستاند اندر آن يوم |
| پس از يك جنگ خونى |
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بشد صمت و سكونى |
| عيان در بين آن خيل |
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دمى آرام شد سيل |
مبارزه و جنگ تن به تن
| چو قدرى آرميدند |
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نفسهايى كشيدند |
| مبارزهاى چالاك |
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دلاورهاى بى باك |
| برون از آن دو صف شد |
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بيكديگر طرف شد |
| تو از حق يك ز باطل |
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شده با هم مقابل |
| تو گويى ابر مرگ است |
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خدنگ آن را تگرگ است |
| گهى ابليس جويى |
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قتيل نيك خويى |
| گهى در حق پرستى |
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ز خصم آمد شكستى |
| دمى حالت چنين بود |
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مبارزها قرين بود |
| به هر سو تاز و تك بود |
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نبرد يك به يك بود |
جنگ مغلوبه
| سپس جنگ دگر شد |
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از اول سخت تر شد |
| دو لشكر ريخت بر هم |
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چو دو مرگ مجسم |
| نگويم شرح اين جنگ |
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كه دلها مى شود تنگ |
| جگر گردد پر الماس |
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ز قطع دست عباس |
| ز خون دل رخ احمر |
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شود از قتل اكبر |
| چو نتوان گفت حالش |
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بيان سازم ماءلش
(16) |
| ماءل جنگ شد اين |
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كه ياران شه دين |
| سر از كف جمله دادند |
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به بحر خون فتادند |
| ز جان خود گذشتند |
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همه مقتول گشتند |
| به خاك تيره خفتند |
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به باغ خود رفتند |
| از آن شيران هيجا |
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نه يك تن مانده بر جا |
| بشد آن دشت خالى |
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از آن مردان عالى |
كان على بن الحسين عليهما السلام يقول
ايما مؤ من دمعت عيناه لقتل الحسين بن على دمعة حتى تسيل على خده
بوّاءه الله بها فى الجنه غرفا يسكنها احقابا و ايما مومن دمعت عيناه
حتى تسيل على خده فينا لاذى مسنا من عدونا فى الدنيا بواءه الله بها فى
الجنة مبواء صدق
(كامل الزيارات ، ص 106.)
ديده هر مومن براى شهادت حسين (عليه السلام ) گريان شود، تا جايى كه بر
صورتش جارى شود خداوند متعال غرفه هايى در بهشت به او عنايت كند كه
دائم در آن سكونت نمايد. و هر مومنى به خاطر آزارى كه ما در دنيا از
دشمنان ديديم بر ما گريه كند تا اشكش بر چهره اش بريزد خداوند او را در
بهشت اقامت صدق و هميشگى دهد.
فصل دوم : برادر و خواهر
ساعت دوم بعد از ظهر
| يكى پر حال روزيست |
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هواى جسم سوزيست |
| دو از پيشين گذشته |
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حرارت سخت گشته |
| شعاع خور زياد است |
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به عين اشتداد است |
| چنان سخت است گرما |
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كه چسبد بر زمين پا |
| هوا آنسان پر آزر |
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كه جوشد مغز در سر |
| شود بر سنگ تخته |
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ز گرمى گوشت به پخته |
| زمين آنقدر ببينم |
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كه گر ريزم هر دم |
| به خاك از آب مشكى |
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نگردد رفع خشكى |
| لب تشنه برد رشك |
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به حال چشم پر اشك |
وضعيت ميدان جنگ
| در اين جوش حرارت |
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هم آن اهل شرارت |
| هم آن قوم بدانديش |
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كه گفتم حالشان پيش |
| در آن دشت بلاخيز |
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كه كردم وصف آن نيز |
| به كف شمشير تيزند |
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مهياى ستيزند |
| همه دلشاد و خرم |
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كه شد يار حسين كم |
| يكى گويد بشارت |
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كه آمد وقت غارت |
| كنون آسان شده كار |
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شده شهر بى علمدار |
| علمدارش تلف شد |
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دلش غم را هدف شد |
| يكى گويد كه ياران |
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حسين را نيست اعوان |
| اگر مى داشت ياور |
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نمى شد كشته اكبر |
| يكى در ترك تازى |
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كه آخر گشته بازى |
| دم صبر و ثبات است |
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همين دم شاه مات است |
| به هر سو جست و خيزيست |
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عجب يك رستخيزست |
| صداها هست بارز |
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الا هل من مبارز |
وضعيت حرم سرا
| در اين آشوب و غوغا |
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به ديگر سمت صحرا |
| نمايان خيمه هايى ست |
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در آن شور و نوايى است |
| فغان و ناله برپاست |
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خروش آن ، جمع زنهاست |
| به يك سمت بيابان |
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چو خور يك خيمه تابان |
| به هر وضعش گواهى |
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كه باشد جاى شاهى |
| در خيمه سواريست |
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تنش پرزخم كاريست |
| دل غمگين ستاده |
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به نيزه تكيه داده |
| اگر پرسى كه هست اين |
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بزرگ آل ياسين |
| رئيس اهل بطحا |
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فروغ چشم زهرا |
| انيس قلب حيدر |
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امين رب داور |
| عزيز جان احمد |
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گل باغ محمد |
| امام عالمين است |
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شه بيكس حسين است |
| به جرم اينكه ننمود |
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خلاف حكم معبود |
| به اصل فسق و بدعت |
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به طوع و ميل بيعت |
| شد اول از وطن دور |
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سپس از مكه مهجور |
| كنون مانده ست بى يار |
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ميان قوم اشرار |
| على اكبر جوانش |
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برادر زادگانش |
| برادرهاى شيرش |
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جوانان دليرش |
| رجال جان نثارش |
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صغير شيرخوارش |
| همه از دست رفته |
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به خون و خاك خفته |
| به دورش معشر زن |
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تمامى گرم شيون |
| سراسر رنج برده |
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همه اقوام مرده |
| يكى گويد كه بابا |
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امان از جوش گرما |
| يكى در آه و فرياد |
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كه داد از تشنگى داد |
برادر و خواهر
| به پيش آن سواره |
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چو يك تابان ستاره |
| عيان رنگ پريده |
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زنى قامت خميده |
| بود آن ماه پيكر |
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ورا بيچاره خواهر |
| همان فرخنده اقبال |
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همان شوريده احوال |
| همان محبوبه رب |
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كه نامش هست زينب |
| زنى زار و بلاكش |
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محمد جد پاكش |
| على باب گرامش |
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بتول پاك نامش |
| نه از پيرى قدش خم |
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خم است از كثرت غم |
| ز داغ هر دو فرزند |
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ز قتل خويش و پيوند |
| لبش از تشنگى خشك |
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چو كافورش شده مشك
(17) |
| نه از پيرى سفيد است |
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ز زحمت ها كشيده است |
| در اين ساعت نه بر سر |
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كسش جز يك برادر |
| برادر هم روان است |
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به فكر ترك جان است |
| به خواهر هم يقين است |
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كه ديدار آخرين است |
| كنون دارد به خاطر |
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كه اندر وقت آخر |
| برادر را ببيند |
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دمى با او نشيند |
| كند راز دل خويش |
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بگويد مشكل خويش |
| ولى وقت نشستن |
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نمانده بهر اين زن |
| مخالف جنگجويند |
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همه در هاى و هويند |
| اگر در جنگ آنها |
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كند فرزند زهرا |
| دمى ديگر تاءنى |
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اعادى بى تبانى |
| به خيمه در مى آيند |
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زنان را مى ربايند |
گفتار خواهر
| چو زينب ديد ناچار |
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جدا مى گردد از يار |
| به رخسار برادر |
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بسى زد بوسه خواهر |
| دو ديده ساخته رود |
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زبانش در سخن بود |
| كه اى آرام جانم |
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بزرگ خاندانم |
| تو هستى از تبارم |
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به تو هست افتخارم |
| ز بودت عشرتم هست |
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وجودت عزتم هست |
| در اين دنياى فانى |
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به طفلى و جوانى |
| روانى شاد بودم |
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ز غم آزاد بودم |
| چه احمد ذات محمود |
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مرا جدى بسر بود |
| چو حيدر مرد نامى |
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بُدم باب گرامى |
| چو زهرا مادرم بود |
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به زانويش سرم بود |
| به دورم انجمن بود |
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برادر چون حسن بود |
| چو احمد شد به دنيا |
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به سوى رب اعلا |
| پس از جدم پيمبر |
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انيسم بود مادر |
| چو مادر از سرم رفت |
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فروغ از اخترم رفت |
| دلم خوش با پدر بود |
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مرا او تاج سر بود |
| چو حيدر خفت در خون |
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به تيغ دشمن دون |
| وجودت افسرم بود |
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حسن تاج سرم بود |
| چو او شد كشته زهر |
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بريد از او مرا دهر |
| تو بودى در بصر نور |
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به تو دل بود مسرور |
| كنون خواهى تو مردن |
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به غربت جان سپردن |
| مرا در غم گذارى |
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به نامحرم سپارى |
| چه سازد يك زن فرد |
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ميان جمع نامرد |
| اگر تنها تنم بود |
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نه با كس دشمنم بود |
| ولى در اين بيابان |
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چه سازم با يتيمان |
| منم يك بينوا زن |
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به دورم شصت و شش تن |
| زنان داغ ديده |
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بنات غم رسيده |
| ندارم محرم و يار |
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به جز يك مرد بيمار |
| كه در بستر فتاده |
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قوا از دست داده |
| چنان طاقت شده طاق |
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كه گردم نزد خلاق |
| قبول افتد دعايم |
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به مرگ خود رضايم |
| تو دائم در حياتى |
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مرا باشد نشاطى |
| اگر از پا فتادى |
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مرا از دست دادى |
| يقين مى دانم اى نور |
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كه چون از تو شوم دور |
| اسير و خوار و زارم |
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به سر چادر ندارم |
| برادر اى برادر! |
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مرا شد خاك بر سر |
گفتار برادر
| خميده خواهر زار |
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مباشد غم دل افگار |
| تويى محبوبه حق |
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ز تو دين راست رونق |
| تو دخت مرتضايى |
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از آل مصطفايى |
| تو را بوده ست شبها |
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مكان در دوش زهرا |
| تو نور آن چراغى |
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گل آن سبز باغى |
| تو شاخ آن درختى |
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به عالم نيك بختى |
| منال از محنت سخت |
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مدان خود را تو بدبخت |
| اگر ديدى تو خوارى |
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عزيز كردگارى |
| به حكم حق رضا باش |
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رضا در هر قضا باش |
| خدا فرمود قسمت |
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كه در اين ملك غربت |
| سر افتد از تن من |
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تو افتى دست دشمن |
| در اين بس مصلحت هاست |
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به آن خلاق داناست |
| براى من شهادت |
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بود خير و سعادت |
| شود چون كشته گردم |
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تويى آيين جدم |
| براه دين اسلام |
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مرا مرگ است اكرام |
| نيفتم گر كه بر خون |
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يزيد فاسق دون |
| به دنيا دير ماند |
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به مردم حكم راند |
| دهد از ظلم و بيداد |
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اساس شرع بر باد |
| ولى چون كشته گشتم |
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ز دنيا در گذشتم |
| پس از مرگم بدنيا |
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شود آشوب برپا |
| بخيزد انقلابى |
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عيان گردد سحابى |
| چنان سيلى براند |
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كه يك ظالم نماند |
| يزيد از بعد مرگم |
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بماند در جهان كم |
| بزودى جان سپارد |
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جهان را واگذارد |
| شود گم اعتبارش |
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همه خويش و تبارش |
| تو را نامى بلند است |
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مقامى ارجمند است |
| اگر بينى حقيرى |
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رويه بر اسيرى |
| ندارد اين دوامى |
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تو آخر نيك نامى |
| به دنيا و به عقبى |
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شود خصم تو رسوا |
| شوى چندى تو محبوس |
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ولى برجاست ناموس |
| نپايد حبس اندى |
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خلاصى گشته سختى |
| دهد لطف خدايى |
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ز زندانت رهايى |
| سپس پاداش زحمت |
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الى روز قيامت |
| برحمت مى شوى ياد |
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تو با آباء و اجداد |
| مشو خواهر پريشان |
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مشو همشيره گريان |
گفتار خواهر
| ايا سردار زينب |
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ايا غمخوار زينب |
| فروزان ماه زينب |
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امام و شاه زينب |
| سخنهاى تو پند است |
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بسى خوشتر ز قند است |
| زدايد تلخى هجر |
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فزايد قوت و صبر |
| به تو اى اصل ايمان |
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مرا عهد است و پيمان |
| كه باشم زينب تو |
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محمد مطلب تو |
| به مقصود شريفت |
|
بمنظور منيفت |
| كنم با بردبارى |
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به طوع و ميل يارى |
| ز عهد طفلى و مهد |
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كه بودم با تو هم عهد |
| رضايم شد رضايت |
|
قوايم شد فدايت |
| پس از تو هم قوايم |
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فدايت مى نمايم |
| كنم بهر مرامت |
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به هر غم استقامت |
| دمى در نزد من ايست |
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بگو تكليف من چيست |
گفتار برادر
| عزيزه خواهر من |
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كه هستى ياور من |
| مرا تو غمگسارى |
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ز مادر يادگارى |
| تو را كاريست دشوار |
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تكاليفى است بسيار |
| تو را هست اى نظيفه |
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يكى چندين وظيفه |
| به پيش ات هست كارى |
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به دوشت هست بارى |
| كه منزل بردن آن |
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نباشد كار نسوان |
| ولى هستى تو خواهر |
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چو سان اثنين مادر |
| به عصمت چون بتولى |
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به طاقت چون رسولى |
| به جرات شير غايى |
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شبيه بوترابى |
| به عقل و صبر فردى |
|
زن اما شير مردى |
| به تو دارم گمانى |
|
كه بعد از من توانى |
| دهى انجام اين كار |
|
به منزل آرى اين بار |
| چو من رفتم به ميدان |
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تو با زنها و طفلان |
| زر و زيور بريزيد |
|
لباس از بر بريزيد |
| همه كهنه بپوشيد |
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همه در صبر كوشيد |
| به يك خيمه در آئيد |
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جدا از هم مپائيد |
| زر و رختى كه داريد |
|
به دشمن واگذاريد |
| اگر اين كار كرديد |
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يقين دانم كه گرديد |
| به وقت نهب
(18) و غارت |
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همه حفظ از حقارت |
| نياندازند لشكر |
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براى زيور و زر |
| به دست و پايتان دست |
|
شما را لايق اين هست |
| در آن ساعت كه اشرار |
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هجوم آرند يك بار |
| گمانم خصم سركش |
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زند بر خيمه آتش |
| شوند از خوف نيران |
|
همه اطفال حيران |
| چو اين شورش به پا شد |
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حريق خيمه ها شد |
| تو با اطفال و زنها |
|
بكش خود را به صحرا |
| در آن دم خصم غدار |
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چو بيند مرد بيمار |
| به سوى او بتازد |
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كه كار او بسازد |
| عزيزم خوب هوش دار |
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مبادا گردد اين كار |
| كه هست از من بدنيا |
|
همين فرزند برجا |
| شما را او امام است |
|
امام خاص و عام است |
| كند خالق نمايان |
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ز نسل اش رهنمايان |
| به جسمش تب فكنده |
|
براى اينكه زنده |
| بماند بعد مرگم |
|
رسد فيض اش به عالم |
| چو خواهد شمر ابتر |
|
از او سازد جدا سر |
| شكايت كن تو از او |
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به پيش مير اردو |
| در آن دم گردد آن مير |
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از اين كارش جلوگير |
| چون اين قوم دم آشام |
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به سوى كوفه و شام |
| شما را كوچ دادند |
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به صحرا رو نهادند |
| به صحراهاى حائل |
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مباشد خويش غافل |
| هوادار زنان باش |
|
به فكر دختران باش |
| تو شخص كاردانى |
|
بزرگ كاروانى |
| از اين زنها و طفلان |
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اگر كس در بيابان |
| اگر از كاروان ماند |
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و يا بى آب و نان ماند |
| به هر نوعى توانى |
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مدد او را رسانى |
| ز رنج و بى نوايى |
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چو داد از حق رهايى |
| رسيدى در مدينه |
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بگو اى بى قرينه |
| سلامم با محبان |
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مشو همشيره گريان |
پيرهن كهنه
| وصيت شد چو پايان |
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بكرد آن شاه خوبان |
| طلب از دخت زهرا |
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لباس مندرس را |
| بپوشيدش به پيكر |
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از او پرسيد خواهر |
| كه مى پوشى چرا اين ؟ |
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بگفت آن سرور دين |
| كه چون سر از تن من |
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فتد با تيغ دشمن |
| گروه پر شرارت |
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برند رختم به غارت |
| ولى در رخت پاره |
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ندارد كس نظاره |
| نه آن را قيمتى است |
|
نه در آن رغبتى است |
| چو كم قيمت نمايد |
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در اين فكرم كه شايد |
| بماند بر تنم آن |
|
نباشم لخت و عريان |
| عزيزم وقت جنگ است |
|
نه هنگام درنگ است |
| عدو در قيل و قالند |
|
مهياى قتالند |
| زمانى گوش بگشا |
|
كه در هر سمت صحرا |
| چه غوغا هست و فرياد |
|
تو را حافظ خدا باد |
| كه من رفتم به ميدان |
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مشو همشيره گريان |
عن ابن سنان قال :
قلت لابى عبدالله (عليه السلام ): جعلت فداك ، ان اباك كان يقول فى
الحج : يحسب له بكل درهم انفقه الف درهم . فما لمن ينفق فى المسير الى
ابيك الحسين (عليه السلام )؟ فقال : يابن سنان يحسب له بالدرهم الف و
الف - حتى عد عشرة - و يرفع له من الدرجات مثلها و رضا الله تعالى خير
له و دعاء محمد و دعاء اميرالمؤ منين و الائمه (عليهم السلام ) خير له
.
(كامل الزيارات ، ص 138)
ابن سنان گفت : به امام صادق (عليه السلام ) گفتم : فدايت شوم ، پدرت
مى فرمود: در برابر هر درهم كه براى حج مصرف شود هزار درهم جزا و مزد
است ، در برابر زيارت پدرت حسين (عليه السلام ) چه اندازه ؟ فرمود،
هزار هزار؛ تا ده مرتبه حضرت شمردند و گفتند: به همين صورت درجات او
بالا مى رود، و خشنودى خدا و دعاى پيامبر و اميرالمؤ منين و امامان
براى او بهتر است .
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