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مقتل بهلول
شيخ محمد تقى بهلول
تنظيم كننده : حسين محمدى گل تپه
- ۳ -
فصل
سوم : شهادت
طبل و شيپور
| صداى طبل و شيپور |
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كه در جنگ است مشهور |
| بگو شايد به هر آن |
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ز فوج آل سفيان |
| رسد از دور و نزديك |
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به كيهان صورت موزيك |
| بلند آواز از طبل |
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كه بگسست از حسين حبل |
| همى گويد نقاره |
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به لشكر البشاره |
| بشارت قوم ناكس |
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حسين گرديده بى كس |
| بشارت فوج فاجر |
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كه گشته جنگ آخر |
| شده كشته جوانان |
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فنا شد پهلوانان |
| نمانده غير يك تن |
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ترن تن تن ترن تن
(19) |
| نهال باغ حيدر |
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شده بى برگ و بى بر |
| تنه مانده و ريشه |
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كنون بايد به تيشه |
| درخت از ريشه كندن |
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ترن تن تن ترن تن |
| على اكبر جوانش |
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برادر زادگانش |
| برادرهاى شيرش |
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جوانان دليرش |
| رجال جانثارش |
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صغير شير خوارش |
| همه از دست رفته |
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به خون و خاك خفته |
| نمانده غير يك تن |
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ترن تن تن ترن تن |
| بكوشيد اى دليران |
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كه از جسمش رود جان |
| زمان آن رسيده |
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سرش گردد بريده |
| ببايد سعى كردن |
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ترن تن تن ترن تن |
| زنان و دخترانش |
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تمام خاندانش |
| همين شب دستگيرند |
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بدست ما اسيرند |
| بخواهيم آن زنان را |
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گروه بى كسان را |
| به شام و كوفه بردن |
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ترن تن تن ترن تن |
حمله شديد
| سپاه پر توحّش |
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همه گرم تعيّش |
| كه مه روى يد الله |
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مصور گشت ناگاه |
| ز خيمه شد به ميدان |
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نژاد شاه مردان |
| به كف شمشير بران |
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مثال شير غران |
| صفوفى كه دمى قبل |
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منظم بود چون حبل |
| ز هم بگسيخت آنسان |
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كه گردد مهره پاشان |
| قيامت گشت پيدا |
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چو زد خود را بر اعدا |
| يكى نيزه فكنده |
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سوى كوفه دونده |
| چو گربه از پلنگى |
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گريزد بى درنگى |
| دگر كس كرده چون موش |
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ره خود را فراموش |
| فكنده يك سپاهى |
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به شط خود را چو ماهى |
| يكى گرديده چون مار |
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گريزان جانب غار |
| يكى را شد پسر گم |
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يكى را خود سر گم |
| يكى شمشيرش از دست |
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بيفتاد و ز صف جست |
| يكى از ترس جانش |
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فتاد از كف كمانش |
قصد آب
| چَو شد از هيبت شاه |
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مثال جمع روباه |
| فرارى قوم هرزه |
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حسين چون شير شرزه |
| پى آنها دوان شد |
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به سوى شط روان شد |
| چو مير آن جماعت |
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نظر كرد اين شجاعت |
| بشد لرزان تن وى |
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بزد بر فوج خود هى |
| كه هان اى تيره روزان |
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در اين گرماى سوزان |
| اگر نوشد حسين آب |
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ظفر بينيد در خواب |
| لب او گر شودتر |
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سيه ما راست اختر |
| به هر قيمت كه باشد |
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اگر چه جان خراشد |
| به سويش روى آريد |
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از آبش باز داريد |
| ز هر جانب بتازيد |
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ز شطاش دور سازيد |
شدت جنگ
| سپاه ترس خورده |
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قشون دل فسرده |
| به تحريك سر افسر |
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دوباره شد دلاور |
| قرارى ها ز هر سو |
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به هم دادند بازو |
| صف پاشيده از هم |
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دوباره شد منظم |
| هر آن قوه كه موجود |
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در آن قوم دنى بود |
| مرتب ساختندش |
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به كار انداختندش |
| كه گردد شاه مظلوم |
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ز شرب آب محروم |
| ز يك سو بارش تير |
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هو را كرده چون قير |
| ز يك سو پرش سنگ |
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فضا را ساخته تنگ |
| هجوم آور سواران |
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همه شمشيرداران |
| به كف نيزه پياده |
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سوى شر رو نهاده |
| شه دين چست و چالاك |
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نكرده نيم جو باك |
| در آن درياى لشكر |
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چو ماهى شد شناور |
| به دستش خون چكان تيغ |
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چو يك آتشفشان ميغ |
| يكى را بر كمر زد |
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دگر كس را به سر زد |
| بقدرى سر ز تن ريخت |
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كه دشمن باز بگريخت |
| صف اشرار بگسست |
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دل فجار بشكست |
| سپاه شوم دشمن |
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ز بس سر ديد بى تن |
| ز ميدان منزجر شد |
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جراد منتشر شد |
ورود به شط
| چو بر آن كشتى نوح |
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ره شط گشت مفتوح |
| شه لب تشنه چون بط |
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فرس را راند در شط |
| ننوشيده هنوز آب |
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كه تيرى گشت پرتاب |
| به فهم آمد چنانش |
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كه پر خون شد دهانش |
| شه از شط تشنه برگشت |
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ز شرب آب بگذشت |
| هنوز از آن جراحت |
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نكرده استراحت |
| كه آمد از صف جنگ |
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به پيشانى او سنگ |
| حسين را چهره شق شد |
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رخ از خون چون شفق شد |
| دو چشم اش خون گرفته |
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ز جسم اش قوه رفته |
| كه تير يك معاند |
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بقلبش گشت وارد |
| و تينش گشت مقطوع |
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روان شد خون چو ينبوع |
| در آن دم زد لعينى |
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به فرقش تيغ كينى |
| زدش ديگر سيه رو |
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يكى نيزه به پهلو |
| نماند از زخم كارى |
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در او تاب سوارى |
| ز پشت اسب افتاد |
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جبين بر خاك بنهاد |
لشكر به حرمسرا مى روند
| سپاه ترس خورده |
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قشون دل فسرده |
| چون اين حالت بديدند |
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ز دل نعره كشيدند |
| بر آمد از ميانه |
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نفير شاديانه |
| شدند اعراب جاهل |
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به نهب مال مايل |
| به سوى خيمه اعراب |
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روان شد مثل سيلاب |
| امام صاحب اعجاز |
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به رب خويش دمساز |
| به خون رخسار شسته |
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وصال يار جسته |
| چو بشنيد اين هياهو |
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نظر انداخت آن سو |
| حقيقت را چو دريافت |
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براى دفع بشتافت |
| ولى از زخم وافر |
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نشد بر دفع قادر |
| ز جا برخاست چون باد |
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ولى بر خاك افتاد |
| چو نامد كارش از دست |
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سر دو پاى بنشست |
| زبان وعظ بگشود |
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به آن جهّال فرمود |
| كه اى اوباش فاجر |
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عرب هستيد آخر |
| عرب را نخوتى هست |
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حيا و غيرتى هست |
| شما را كو هميت ؟ |
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كجا شد آدميت ؟ |
| بگفتش شمر مردود |
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از اين حرفت چه مقصود |
| بگفتا مقصد اين است |
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اگر انصاف و دين است |
| كه تا كارم نسازيد |
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سوى خيمه نتازيد |
| بگفتش شمر سهل است |
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حسين هم رزم اهل است |
| ببايد دفع او كرد |
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سپس در خيمه رو كرد |
| به حكمش قوم منفور |
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شدند از خيمه ها دور |
زينب سلام الله عليها در
قتلگاه
| ولى زينب خبر شد |
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كه خاك او را بسر شد |
| دمى كه ديد خواهر |
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سوى اسب برادر |
| كه زينش غرق خون است |
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سر و دم غرق خون است |
| بر آمد آن زكيه |
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به تل زينبيه |
| فكند آن دخت زهرا |
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نگاهى سوى صحرا |
| در آن صحرا چه بيند |
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الهى كس نبيند |
| حسين افتاده بر خاك |
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ميان قوم سفاك |
| به دورش بيشماره |
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پياده و سواره |
| همه بى رحم و خونريز |
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به كف ها اسلحه تيز |
| هر آن حربه كه دارند |
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به جسم اش مى گذارند |
| ستاده شمر بدخو |
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بقصد كشتن او |
| سپه سالار دل سنگ |
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كه گشته فاتح جنگ |
| سلاح از تن گسسته |
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تماشاگر نشسته |
| نبيند هيچ خواهر |
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به اين حالت برادر |
گفتار خواهر
| چو زينب ديد پامال |
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برادر را به آن حال |
| به سرعت شد روان او |
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به سوى مير اردو |
| به مژگان صد گوهر سفت |
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به آن بيدادگر گفت |
| كه اى از مردمى دور |
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ز حس رحم مهجور |
| چه سان اين حال بينى |
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تماشاگر نشينى |
| در اين غوغا كه برپاست |
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كجا جاى تماشاست |
| حسينم اوفتاده |
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قوا از دست داده |
| كنندش پاره پاره |
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كنى سويش نظاره |
| چو مقدارى سخن گفت |
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جواب از خصم نشنفت |
| دويد او چشم خونبار |
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به سوى شمر خونخوار |
| به شمر شوم فرمود |
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هر آن چه گفتنى بود |
| نداد او چون جوابش |
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فزون شد اضطرابش |
| در آن دم كرد زينب |
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برادر را مخاطب |
| عزيز جان زارم |
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چراغ شام تارم |
| ضياء هر دو عينم |
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شه بى كس حسينم |
| انيس قلب ريشم |
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شه بى قوم و خويشم |
| حسين مه جبينم |
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چه حال است اينكه بينم |
| چه آمد بر سر تو |
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بميرد خواهر تو |
| الهى كور باشم |
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نصيب گور باشم |
| ببينم قلب پرسوز |
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تو را من در چنين روز |
| كنم سويت نظاره |
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ندارم هيچ چاره |
| بيابان پر ز دشمن |
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نباشد دوست يك تن |
| نه يك با غيرت راد |
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كه از وى جويم امداد |
| برادر اى برادر! |
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مرا شد خاك بر سر |
گفتار برادر
| بلاكش زينب من |
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مكن زارى به دشمن |
| كه اين قومند بى شرم |
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در آنها نيست آزرم |
| مبادا دشمنانت |
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رسانندت اهانت |
| هزاران زخم بر تن |
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به است از طعن دشمن |
| مرا در راه معبود |
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شهادت بود مقصود |
| به مقصود رسيدم |
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همين ساعت شهيدم |
| تو را دارد لياقت |
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كه سازى صبر و طاقت |
| به هر درد و بليه |
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به هر رنج و رزيه |
| على را دخترى تو |
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ز زنها برترى تو |
| تو را زهراست مادر |
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بود جدت پيمبر |
| مشو مانند زنها |
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عزيزم ناشكيبا |
| به زنها ياورى كن |
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به طفلان مادرى كن |
| به خيمه روز ميدان |
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مشو خواهر تو گريان |
عن ابى جعفر (عليه السلام ) قال سمعته يقول :
من اراد ان يعلم انه من اهل الجنة فليعرض حبنا على قلبه فان قبله فهو
مومن و من كان لنا محبا فليرغب فى زياره قبر الحسين (عليه السلام ) فمن
كان للحسين (عليه السلام ) زوارا عرفناه بالحب لنا اهل البيت و كان من
اهل الجنة ، و من لم يكن للحسين (عليه السلام ) زوارا كان ناقص
الايمان .
((كامل الزيارات ، ص 212))
راوى مى گويد از حضرت باقر (عليه السلام ) شنيدم مى فرمود:
كسى كه مى خواهد بداند از اهل بهشت است دوستى ما را بر قلبش عرضه بدارد
اگر پذيرفت مومن است و هر كس كه عاشق ماست رغبت در زيارت قبر حسين
(عليه السلام ) مى نمايد، پس كسى كه زائر حسين (عليه السلام ) است ، او
را به محبت خود مى شناسيم و اهل بهشت است و آن كه زائر حسين (عليه
السلام ) نيست ايمانش ناقص است .
فصل چهارم : شام غريبان
شام غريبان
| شبى مملو از احزان |
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چو شبهاى غريبان |
| به تن پوشيده عالم |
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لباس اهل ماتم |
| نسيم فصل ريزان |
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وزان اندر بيابان |
| از آن در بحر و در بر |
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شكسته شدّت حرّ |
| هراسان سبزه و برگ |
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كه آمد قاصد مرگ |
| به لرز اوراق اشجار |
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كه دشمن شد نمودار |
| ز آن پهلوى شوهر |
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بخفته روى بستر |
| صغيران با پدرها |
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به بالين هشته سرها |
| همه خوابند و آرام |
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به صحن خانه و بام |
| مباشد شخص بيدار |
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به غير ذات دادار |
| نه چشمى در نظاره |
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به جز چشم ستاره |
صحراى موحشه
| بيابانى است موحش |
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كه در آن نيست جنبش |
| شده بر دشت و صحرا |
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خموشى حكمفرما |
| گرفته صحنه ارض |
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كمى از نور مه قرض |
| از آن گرديده روشن |
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تمام دشت و دامن |
| زنان پهلوى شوهر |
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بخفته روى بستر |
| صغيران با پدرها |
|
به بالين هشته سرها |
| همه خوابند و آرام |
|
به صحن خانه و بام |
| مباشد شخص بيدار |
|
به غير ذات دادار |
| نه چشمى در نظاره |
|
به جز چشم ستاره |
اردوى خوابيده
| ميان دشت و صحرا |
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يكى اردوست پيدا |
| كه منصب دار و عسكر |
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به خواب افتاده يكسر |
| همه ساكن چو سايه |
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مباشد كس طلايه |
| ببايد خوش بخوابند |
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كه جمله كاميابند!! |
| چرا خوش نگذرانند |
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كه اكنون فاتحانند |
| شده مغلوب دشمن |
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نمانده زنده يك تن |
| نباشد حاجت پاس |
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كه زنده نيست عباس |
| سپه در عيش و امن است |
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كه شمشير حسين نيست |
| همين لشكر شب پيش |
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ز فرط ترس و تشويش |
| غروب جمله بود آب |
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برون از چشمشان خواب |
| كنون هستند راحت |
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دوا كرده جراحت |
| ز نان و آب پرجوف |
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بدون وحشت و خوف |
| خوشند از اينكه فردا |
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گرفته مال يغما |
| كند هر كس عزيمت |
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به خانه با غنيمت |
نظرى به قتلگاه
| به ديگر سمت صحرا |
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به خاك افتاده هر جا |
| بدنها از كسانى |
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كه آنها را تو دانى |
| تمامى مومن خاص |
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تمامى اهل اخلاص |
| همه اصحاب فرقان |
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همه محمود خلقان |
| همه پاكيزه رايان |
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همه صاحب وفايان |
| همه انصار احمد |
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فداكار محمد |
| منور دل ز زيتش |
|
محب اهل بيتش |
| همه در روز سابق |
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بدست قوم فاسق |
| به عشق شاه لولاك |
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بيفتادند بر خاك |
| گذشتند از سر جان |
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به راه دين يزدان |
| يكى در يارى حق |
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سرش گرديده منشق |
| يكى از عشق حق مست |
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بخون غلطيده بى دست |
| يكى را در دهن شير |
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گلويش پاره از تير |
| يكى را چاك سينه |
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ز عمق اهل كينه |
| ز خون حق پرستان |
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شده صحرا گلستان |
| در آن گلزار پيدا |
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بود انواع گلها |
| ميان آن شهيدان |
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در آن پر هول ميدان |
| به خاك افتاده بى سر |
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تن سبط پيمبر |
| ز نورش دشت وهاج |
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لباسش گشته تاراج |
| ز جور اهل بيداد |
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فزون زخمش ز هفتاد |
زنان بى صاحب
| در آن دشت غم آور |
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قريب فوج عسكر |
| نمايان خيمه اى هست |
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كه شبه دخمه اى هست |
| از آن خيمه نواها |
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نواى بى نواها |
| رسد هر لحظه بر گوش |
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كه از آن دل زند جوش |
| نوا صوت زنان است |
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صداى اختران است |
| كه بى يار و معين اند |
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به زحمت هم قرين اند |
| شده مردان آنها |
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قتيل از تيغ اعدا |
| چه گويم حال ايشان |
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شود دلها پريشان |
| نباشد تاب تقرير |
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نه هست امكان تقرير |
| يكى را دست بر سر |
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ز هجران برادر |
| يكى را سر به زانو |
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كه فرزندان من كو |
| زند يك زن به سينه |
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كند ياد از مدينه |
| يكى در شور و غوغا |
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به ياد شهر بطحا |
| يكى دستش به شانه |
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كه خورده تازيانه |
| يكى را گشته نيلى |
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رخ و گردن ز سيلى |
| خراشد يك نفر رو |
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كَند آن ديگرى مو |
| به يك سو بى نصيبى |
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كند داد از غريبى |
| به يك سو دل دو نيمى |
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كشد آه از يتيمى |
| گل پژمرده زينب |
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برادر مرده زينب |
| بزرگ آن زنان بود |
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چو بلبل در فغان بود |
| دلش از غم لبالب |
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چنين مى گفت آن شب |
ياد ديشب
| امان از درد هجران |
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امان از فقد ياران |
| امان از رنج غربت |
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امان از اين مصيبت |
| عزيزان ياد ديشب |
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كه عزت داشت زينب |
| فروزان اخترم باد |
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برادر بر سرم بود |
| خوشا صوت تلاوت |
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خوشا بانگ قرائت |
| كه مى آمد سحرگاه |
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به گوش از مسكن شاه |
| جهان گر پربلا بود |
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حسين دلجوى ما بود |
| حسين غمخوار ما بود |
|
به هر غم يار ما بود |
| كنون يارى نداريم |
|
پرستارى نداريم |
| ببين اين حال يا رب |
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عزيزان ياد ديشب |
ابدان شهدا
| چو اين جام مرصّع |
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برون آمد ز مطلع |
| بشد يك نيزه بالا |
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به حكم حق تعالى |
| سپه سالار بدبخت |
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عمر بن سعد دل سخت |
| سپه را رخصتى داد |
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براى دفن اجساد |
| به حكم آن جفاكار |
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هر آن چه بود مردار |
| از آن ابدان ناپاك |
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همه شد دفن در خاك |
| ولى جسم شهيدان |
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به روى خاك ميدان |
| نه كس را شد اجازه |
|
كه بگذارد جنازه |
| نه كس را بود يارا |
|
براى دفن آنها |
| رسيد امر و فرمان |
|
كه اين ابدان عريان |
| به روى خاك بايد |
|
نه كس دفنش نمايد |
| جدا بايد شود سر |
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از اين اجساد يك سر |
| نه اين باشد كفايت |
|
مجازات جنايت |
| كه بايد اين بدنها |
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به خاك افتاده تنها |
| به زير نعل اسبان |
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شود با خاك يكسان |
زنها در قتلگاه
| چو اجرا گشت هر كار |
|
سپه را بسته شد بار |
| سپه سالار گفت اين |
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به افواج شياطين |
| كه بايد كوچ كردن |
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زنان را كوفه بردن |
| چو زنهاى ستم كش |
|
اسيران مشوش |
| شدند از خيمه بيرون |
|
ميان دشت و هامون |
| تمامى ناگهانى |
|
چو گلهاى خزانى |
| شدند افتان و پاشان |
|
به روى كشته هاشان |
| دوان ليلاى مضطر |
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به سوى نعش اكبر |
| روانه ام كلثوم |
|
سوى عباس مظلوم |
| گرفته هر اسيرى |
|
به هر نعش اميرى |
| شده هر نااميدى |
|
نواخوان بر شهيدى |
| امان از حال زينب |
|
فغان از حال زينب |
| كدامين سو كند رو |
|
كدامين گل كند بو |
| به يك سو شش برادر |
|
به خاك افتاده بى سر |
| به يك جابن دو فرزند |
|
قتيل افتاده بودند |
| دوان زينب به هر جاست |
|
خدايا او چه مى خواست ؟ |
| يقينى هست او نيز |
|
طلب مى كرد يك چيز |
| ولى آيا چه چيز است ؟ |
|
كه پيش او عزيز است ؟ |
| هويدا بر تمام است |
|
كه مقصودش امام است |
| اگر در شور و شين است |
|
مراد او حسين است |
ناله هاى زينب
| امان از آن دقيقه |
|
كه آن دخت شفيقه |
| تن پاك حسين ديد |
|
جدا راءسش به عين ديد |
| به روى نعش افتاد |
|
به نوعى كرد فرياد |
| كه بر دشمن اثر كرد |
|
عساكر گريه سر كرد |
| بگفتا يا محمد |
|
شه دين يا محمد |
| نظر كن بر حسين ات |
|
ببين نور دو عين ات |
| غريق بحر خون است |
|
ز حد زخمش فزون است |
| بنات خويش را بين |
|
اسير قوم بى دين |
| تو اى حيدر كجايى ؟ |
|
جدا از ما چرايى ؟ |
| تو خفته بر مزارى |
|
خبر از ما ندارى |
| كه بى پشت و پناهيم |
|
گرفتار سپاهيم |
| بيا اى مادر زار |
|
بيا زهراى افگار |
| خبردار از پسر شو |
|
ز دختر باخبر شو |
| پسر گرديده بى سر |
|
اسير خصم ، دختر |
| برادر همدم من |
|
انيس و محرم من |
| گل پر گشته من |
|
به ناحق كشته من |
| اسير و بى پناهم |
|
ببين حال تباهم |
| جلال و جاه زينب |
|
نظر كن آه زينب |
| كجا شد شفقت تو؟! |
|
حنان و رفقت تو |
| به زنها و اسيران |
|
بر ايتام و صغيران |
| چه شد دلجويى تو |
|
چه شد خوش خويى تو |
| فدايت خواهر تو |
|
چه شد انگشتر تو |
| كى از دستت كشيده |
|
كه انگشتت بريده |
| به قربان تن تو |
|
چه شد پيراهن تو |
| كه بود آن پرشرارت ؟ |
|
كه كرد آن كهنه غارت |
| تو چون رفتى ز دنيا |
|
جهان شد تنگ بر ما |
| مخالف آتش افروخت |
|
خيام پاك تو سوخت |
| ببردند اهل اغما |
|
متاعت را به يغما |
| تو بودى تا كه حاضر |
|
سر من داشت چادر |
| شدى تا از نظر دور |
|
شدم چادر ز سر دور |
حركت قافله
| به حال گريه خواهر |
|
سر نعش برادر |
| كه مير قوم مردود |
|
صداى كوچ بنمود |
| سپاه اندر هم آمد |
|
عجب يك ماتم آمد |
| عجب چون اين كدام است |
|
كه زينب رو به شام است |
| چو بنشانند اعدا |
|
زنان را بر شترها |
| ره كوفه گرفتند |
|
از آن صحرا برفتند |
| زن بيچاره زينب |
|
ز شهر آواره زينب |
| نظر سوى عقب داشت |
|
سخن ها زير لب داشت |
| برادر جان حقيرم |
|
گرفتارم اسيرم |
| بسى دارم خجالت |
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كه اين اصل ضلالت |
| ندادندم زمانى |
|
مجالى يا امانى |
| كه سازم دفن در خاك |
|
تنت با قلب غمناك |
| عجب يك خواهرم من |
|
كه اندر ملك دشمن |
| تنت بى سر فكندم |
|
لحد بهرت نكندم |
| ره خود را گرفتم |
|
به شهر كوفه رفتم |
| ولى هستم چو مجبور |
|
مرا ميدار معذور |
| شود خواهر فدايت |
|
به قربان صدايت |
| كه مى گفتى تو با من |
|
بوقت گريه كردن |
| مثال مهربانان |
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مشو همشيره گريان |
عن ابى جعفر (عليه السلام ) قال :
كان رسول الله (صلى الله عليه و آله و سلم ) اذا دخل الحسين جذبه اليه
ثم يقول لاميرالمؤ منين (عليه السلام ): امسكه ، ثم يقع عليه فيقله و
يبكى فيقول : يا ابه لم تبكى ؟ فيقول ، يا بنى اقبل موضع السيوف منك و
ابكى . قال : يا ابه و اقتل ؟ قال : اى والله و ابوك و اخوك و انت .
قال ابه فمصار عنا شتّى ؟ قال : نعم يا بنىّ. قال : فمن يزورنا من امتك
؟ قال : لا يزورنى و يزور اباك و اخاك و انت الا الصديقون من امتى .
((كامل الزيارات ، ص 69))
امام باقر (عليه السلام ) فرمود: هر گاه حسين به محضر پيامبر مى آمد
حضرت او را دنبال مى كرد. سپس به اميرالمؤ منين (عليه السلام ) مى
فرمود: او را نگاه دار، سپس روى او مى افتاد و وى را مى بوسيد و گريه
مى كرد حسين (عليه السلام ) مى گفت : پدر چرا گريه مى كنى ؟ مى فرمود:
پسرم ! جاى شمشيرها را مى بوسم و گريه مى كنم . عرضه داشت ! پدر آيا من
كشته مى شوم ؟ فرمود: به خدا قسم پدرت و برادرت و تو كشته مى شويد.
عرضه داشت : محل شهادت ما از هم جداست ؟ فرمود: آرى ، پسرم ! گفت : از
امت تو چه كسى ما را زيارت مى كند؟ فرمود: مرا و پدرت و تو را غير
صديقون از امتم زيارت نمى كند.
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